Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

23. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — शमश्रुलक्षण

शमश्रुलक्षण

अस्फुटिताग्रं स्निग्धं श्मश्रु शुभं मृदु च सन्नतं चैव। रक्कै: परुपैश्चौराः श्मश्रुभिरल्पैश्च विज्ञेयाः ॥ ६२॥ १. चन्द्रविम्बोपमो वक्रो धर्मशीलः सदा भवेत् । मृगमूषिकवक्ताश्च ते नरा भाग्यवर्जिता इति॥ जिनकी दादी मूछ अग्रभाग में विकसित न हो अथवा चिकनी व कोमल होकर सन्नत हो वे शुभसम्पन्न होते हैं। जिनकी दाही मूछ लाल व कड़ी तथा थोड़ी हो उनको चोर जानना चाहिये ॥ ६२॥ निमासैः करषै: पापमृत्यवश्चिपिटैः सुबहुभोगाः।