Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

24. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — कर्शलक्षण

कर्शलक्षण

कृपणाश्च इस्वकर्णा: शङ्कुश्रवणाश्च भूपतयः ॥ ६३ ॥ मांसरहित कानवाले पापकर्म से मौत पाते हैं। जिनके कान चव्टे हों वे बड़े ही भोगशाली होते हैं। जिनके कान छोटे हों वे कृपण होते हैं। जिनके कान शङ्कु के समान हों वे पृथ्वीपाल होते हैं ॥ ६३ ॥ रोमशकर्णा दीर्घायुषस्तु धनभागिनो विपुलकर्णाः । क्रूरा: शिरापनद्धैर्व्यालम्वैर्मांसलैःसुखिनः ॥६४॥ जिनके कान रोमों से व्याप्त हों वे बड़ी उमरवाले होते हैं। जिनके कान बड़े हों वे धनभागी होते हैं। जिनके कान नसों से युक्क तथा विशेपतः लम्बे हों वे क्रूर होते हैं। मांस से भरे हुए लम्बे कानवाले सुखी होते हैं ॥ ६४॥ गएडनासिकालन्षण भोगीत्वनिम्नगएडो मन्त्री संपूर्णमासगएडो यः। सुखभाकू शुकसमनासश्चिरजीवी शुष्कनासश्च ॥ ६५ ॥ नीचा गएडस्थल भोगी का होता है। जिसका गएडस्थल मांसविशिष्ट हो वह मन्त्री होता है। जिसकी नासिका शुक (तोता) की चॉच के समान हो वह सुखभागी होता है। सूखी नासिकावाला चिरजीवी होता है ॥ ६५॥* १. दन्ताश्च विरला यस्य गरडे कृपोऽपि जायते। परस्त्रीरमो नित्यं पर- वित्तेन वित्तवान् । जिस प्रकार शरीर में प्ाण प्रधान हैं इसी प्रकार कन्धों से ऊपर का भाग मी अत्यन्त मुख्य है। इसकी बनावट जाकार-प्रकार आाँख, कान, नाक, मुख, मौँह, मस्तक आदि मुख्य हैं। समस्त ब्रह्माएड के ये द्वार हैं। यदि इनकी आकृति पर विशेष ध्यान दिया जाय तो निश्चय ही, सामुद्रिक-शास्त्री उस मनुष्य के संबंध में भलीभाँति भूत-मविष्यत् एवं उसका आचरण कह सकता है। पाउकों को उपर्युक्क बातें ध्यानपूर्तक पढ़कर मनन कर लेना चाहिये। -संपादक। चिन्नानुरूपयागम्यगामिनो दीर्घया तु सौभाग्यम्। छाकुञ्चितया चौरः स्त्रीमृत्युः स्याचचिपिटनासः॥६६॥ जिनकी नासिका (त्विन्न) कटी-मी हो वे अगम्या रमणी में गमन करते हैं। जिनकी नासिका दीर्घ हो वे सौभाग्य को पाते हैं। जिनकी नासिका टेढी हो वे चोर होते हैं। जिनकी नासिका चपटी हो वे स्त्री से मृत्यु पाते हैं ॥ ६६ ॥ * धनिनोऽग्रवकनासा दक्षिणवक्राः प्रभक्षणः क्रूराः। ऋज्वी स्व्पच्छिद्रा सुपुटा नासा सुभाग्यानाम् ॥ ६७॥ नासिका का अग्रभाग टेढा होना धनी का लक्षण है। जिनकी नासिका दाहनी तरफ़ टेही हो वे मनुष्य बड़े खानेवाले तथा क्रर होते हैं। जिनकी नासिका सीधी, छोटे छेदोंवाली तथा गोल पुटोवाली हो वे म्राखी बड़े भाग्यशाली होते हैं ॥ ६७ ।।