Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

26. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — लोचनलक्षण

लोचनलक्षण

पझ्मदलाभैर्घनिनो रक्रान्तविलोचनांः श्रियो भाजः । मधुपिङ्गलैर्म हार्था मार्जारविलोचना: पापाः ॥६६॥

  • चेहरे पर चित्रफला की दृष्टि से दोनों आँखों की लम्बाई के बराबर नाक तथा कान और मुख होते हैं। यदि इसके विपरीत हो तय उस मनुष्य में कुछ न कुछ विशेषता होगी। जो भाग जिस प्रकार विशेषता रखता हो, उसका उसी प्रकार स्त्रभाव आदि जानना चाहिये। -संपादक। १. अनिस्नात्षाश्च ये काणा वधिरा: स्थूलदेहिनः। स्थूनाश्च सञ्ञगतयो नरा दुष्टा न सशपः॥ शतं काऐें च खञ्जे च अशीतिर्भएडचारयोः । सर्वे च षष्टि- दोषा: स्युः कुब्जस्यान्तं न विद्यते।। १ ॥ जिनके दोनों नयन पददल के समान हों वे धनी होते हैं। लाल नेत्रों- वाले लक्षमीसम्पन्न होते हैं। बादामी अथवा पीले लोचनवाले बड़े अर्थशाली होते हैं। जिनके लोचन बिलार के समान हों वे पापी होते हैं॥ ६६ ॥ हरिणाच्ा मएडललोचनाश्च जिह्ैश्च लोचनैश्चौराः। क्रूरा: केकरनेत्रा गजसदशदशश्च भूपतयः॥ ७० ॥ हरिख के समान या मएडलाकार अथवा टेढ़े नेत्रोंवाले चोर होते हैं। जिनके लोचन कक्षे हों वे क्रर होते हैं। जिनके लोचन हाथी के समान हों वे पृथ्वीपाल होते हैं।। ७० ॥ ऐश्वर्य्यं गम्भीरैर्नीलोत्पलकान्तिभिश्च विद्धांसः। अतिकृष्णतारकाणमक्ष्णामुत्पाटनं भवति ।। ७१ ।। मन्त्रित्वं स्थूलदृशां श्यावाच्ताणां च भवति सौभाग्यम्। दीना दङूनिःस्वानां स्निग्धा विपुलार्थभोगवताम्॥७२॥। जिनके लोचन गम्भीर हों वे ऐश्वर्य पाते हैं। श्याम कमल के समान नेत्र विद्वान् के होते हैं। जिनके लाचनों की तारकाएँ बहुत काली हों, उनकी आंखें उखाड़ी जाती हैं। ७१। जिनके लोचन स्थूल हों वे मन्त्री होते हैं। पीले नेत्र सौमाग्यदाता हैं। जिनके लोचन दीन हों वे दरिद्र होते हैं। जिनके लोचन स्निग्ध (चिकने या प्यारे) हों वे बड़े अर्थशाली व भोगी होते हैं॥। ७२॥ भ्रुकुटिलक्तणण अभ्युन्नताभिरल्पायुषो विशालोन्नताभिरतिसुखिनः। विषमभ्रुवो दरिद्रा बालेन्दुनतम्रुवः सधनाः ॥७३ ॥ जिनकी भौहैं ऊँची उठी हों वे अल्पायु होते हैं। जिनकी भौहैं विशाल तथा ऊँची हों वे बड़े सुखी रहते हैं। जिनकी भौंहैं विषम हों वे दरिद्र होते हैं। जिनकी भौंहें वालचन्द्रपा के समान लची हों वे:धनी होते हैं॥ ७३॥ दीर्घासंसक्ाभिर्धनिनः खएडाभिरर्थपरिहीनाः। मध्यविनतय्रुवो ये तु सक्कास्त्रीष्वगम्यासु॥ ७४ ॥ जिनकी भौहें बड़ी तथा परस्पर मिली अथवा अलग हो वे धनवान् होते हैं। जिनकी मौंहें खषिडत हो वे धनहान होते हैं। जिनकी मौंहैं. बीच में लची हों वे अगम्या रमखी में आ्सक़ होते हैं॥। ७४॥