27. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — ललाटलक्षण
ललाटलक्षण
उन्नतिविपुलैः शंखैर्धन्या निम्नैः सुतार्थसंत्यक्ाः। विषमललाटा विधना धनवन्तोऽर्घेन्दुसदशेन॥ ७५ ॥ जिनके शंख (ललाट के पाश्चों की हड्डियाँ) उन्नत होकर विशाल हों वे धन्य गिने जाते हैं। जिनके शंख निचले हों वे धन व पुत्रों से रहित होते हैं। जिनका ललाट विषम हो वे दरिद्र होते हैं। जिनका ललाट अर्धचन्द्राकार हो वे धनवान् होते हैं। ७५॥ शुक्किविशालैराचार्यता शिरासन्ततैरधर्मरताः । उन्नतशिराभिराव्या: स्वस्तिकवत्संस्थिताभिश्च।।७६।। जिनके कपाल विशाल होकर सीप के समान हो वे आचार्य पदवी पाते हैं। जिनके भाल नसों से व्याप्त हों वे अधर्म में परायख होते हैं। जिनके कपाल की नसे ऊँची तथा त्रिकोणकार प्रतीत हों वे धनाठ्य होते हैं।। ७६ ॥ निम्नललाटा वघबन्धभागिनः क्रूरकर्मनिरताश्च। अभ्युन्नतैश्च भूपा: कृपणा: स्युः संकटललाट:॥७७॥ जिनके ललाट नीचे हों वे वघबन्धमागी होते हैं, यानी वे मारे जाते हैं अथवा बँधुआ होकर दुःख भोगते हैं, वुरे कामों में लगे रहते हैं। जिनके भाल ऊँचे हों वे पृथ्वीपाल होते हैं। जिनके कपाल संकीर्ण हों वे कृपण होते हैं।। ७७।।