Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

29. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — इसितलक्षण

इसितलक्षण

हसितं शुभदमकम्पं सनिमीलितलोचनं च पापस्य। हृष्टस्य हसितमसकृत्सोन्मादस्यासकृत्मान्ते ॥। ७६।। जिनके हँसने में शरीर न काँपे तो उन्हें वह शुभदायक होता है। जिसके हँसने में आँखें मूँद जाव वह पापी होता है। जिसका हँमना बारंवार हो वह सुखी होता है। जो सारी कथा को सुनकर अन्त में वारंवार हँसता है वह पागल होता है।। ७६।। ललाटरेखालन्षण तिसो रेखाः शतजीविनां ललाटायताः स्थिता यदि ताः। चतसृभिरवनीशत्वं नवतिश्चायुः सपञ्चाव्दा॥८०॥ जिनके ललाट में तीन रेखाएँ हों वे सौ वर्ष पर्यन्त जीते हैं। जिनके ललाट में चार रेखाएँ हों वे राजपदवी पाकर पच्चानवे वर्ष जीते हैं॥ ८० ॥ विच्छिन्नाभिश्वागम्यागामिनो नवतिरप्यरेखेण। केशान्तोपगताभी रेखाभिरशीतिवर्षायुः ॥८१॥ जिनके ललाट में छिन्न-भिन्र रेखाएँ हॉ वे अगम्या रमखी में गमन करते हैं। जिनके कपाल में रेखाएँ ही न हों वे नब्बे वर्ष जीते हैं। जिनके कपाल में रेखाएँ बालों के समीप तक पहुँच गई हों वे अस्सी वर्ष पर्यन्त जीते हैं ॥ ८१ ॥ पञ्चभिरायुः सप्ततिरेकाग्रावस्थिताभिरपि षष्टिः। बहुरेखेण शतार्द्ध चत्वारिंशच्च वक्राभिः ॥८२॥ जिनके कपाल में पाँच रेखाएँ हो वे सत्तर वर्ष जीते हैं। जिनके कपाल में रेखाएँ एकाग्रावस्थित हों वे साठ वर्ष जीते हैं। जिनके कपाल में बहुनसी रेखाएँ हॉ वे पचास वर्ष जीते हैं। जिनके कपाल में रेखाएँ टेही हों वे चालीस वर्ष की आयु पाते हैं ॥ ८२ ॥ त्रिंशड्भ्ूलग्नाभिर्विशतिकश्चैव वामवक्राभिः । चुद्राभि: स्वल्पायुर्न्यूनाभिश्चान्तरे कल्प्यम् ॥८३।। जिनके ललाट में रेखाएँ भौंहों से मिली हों वे प्राणी तीस वर्ष जीते हैं। जिनके ललाट में रेखाएँ बाएँ तरफ़ टेढी हाँ वे मागी बीस वर्ष जीने हैं। जिनके कपाल में रेखाएँ छोटी छोटी हों वे स्वल्पायु होते हैं। जिनके कपाल में रेखाएँ कम हों उनकी अल्पायु की ही कल्पना करनी चाहिये ।। ८३ ।। शिगेलनग परिमए डलैर्गवाढ्याश्छत्राकारैः शिरोभिखनीशाः । चिपिटैः पितृमातृप्नाः करोटिशिरसां चिरान्मृत्युः।।८४।। जिनके मस्तक गोल हों वे गोधन-संपन्न होते हैं। जिनके शीश छत्रा- कार (छाते के समान) हों वे पृथ्वीपाल होते हैं। जिनके शीश चपटे हों वे यौवनकाल में माता-पिता के मारनेवाले होते हैं और जिनके शीश बड़े हों वे दीर्घजीवी होते हैं॥ ८४ ॥ घटमूर्द्धाध्यानरुचिर्द्धिमस्तक: पापकृद्ध नैस्त्यक्रः । निम्नन्तु शिरो महतां बहुनिम्नमनर्थदं भवति ॥८५॥ जिसका शीश बड़े के समान हो वह ध्यानपरायण होता है। जिसके दो शीश हों वह पापी व निर्धन होता है। जिनका शीश लचा हो वे महापुरुप होने हैं। बहुत ही गहरा शीश अनर्थदायक होता है॥ =५॥ एकैकभवैः स्निग्धैः कृष्णैराकुञ्चितैरभिन्नाग्रैः । मृदुभिर्न चातिबहुभिः केशेः सुखभाक् नरेन्द्रो वा ॥=६॥ जिनके मस्तक के एक एक रोमकूप में एक एक बाल हो और यदि वे बाल चिकने काले व टेढ़े हों और उनका अग्रभाग भिन्न न हो तथा वे कोमल होकर बहुन से न हों तो वह प्रागी सुखभागी या राजा होता है॥। =६ ॥ बहुमूलविषम कपिला: स्थूलस्फुटिताग्रपरुपइस्वाश्च। अरतिकुटिलाश्चातिघनाश्च मूर्धजा वित्तहीनानाम्।।=७। जिनके मस्तक के एक एक रोमकूप में बहुतसे बाल हों और वे यदि असमान हों तथा पीले हों, अग्रभाग में मोटे होकर टूटे हो, बड़े छोटे व बहुत-से टेढ़े होकर बहुत घने हों तो वे प्राग्ी निर्धन होते हैं॥ ८७॥।