30. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — गात्ररूक्षतालक्षण
गात्ररूक्षतालक्षण
यद्यद्गात्रं रूक्षं मांसविहीनं शिरापनद्धं च। तत्तदनिष्टं प्रोक्तं विपरीतमतः शुभं सर्वम् ॥८८॥ शरीर में जो अंग रूखा, मांसहीन व नसों से व्याप्त हो वह अनिष्ट कहा गया है। इससे विपरीत शुमदायक होता है॥ ८८ ॥