31. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — नाभि आदि के लक्षण
नाभि आदि के लक्षण
नाभि:स्वरं सत्त्वमिति प्रदिष्टं गम्भीरमेतत्त्रितयं नराणाम्। उरो लल।टं वदनं च पुंसां विस्तीर्णमेतत्त्रितयं प्रशस्तम्॥।८६॥। जिनकी नाभि, स्वरव शक्ति ये तीनों गंभीर हों तो वे पुरुष भाग्यवाले होते हैं। िस्तृन वन्षःस्थल, ललाट व मुख ये तीनों गुमदायक होते हैं ॥८६।।