36. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — पृथ्वीछायालक्षण
पृथ्वीछायालक्षण
स्निग्धद्विजत्वड््नखरोमकेशच्छाया सुगन्धा च महीसमुत्था। तुष्ट्यर्थलाभाभ्युदयान्करोति धर्मस्य चाहन्यहनि प्रवृत्तिम॥६४ यदि दाँत, खाल, नख, रोम और केश ये चिकने तथा सुगन्धित हों तो पृथ्वीतत्व से उपजी छाया (शरीर की शोभा) जानना चाहिये। यह प्राणियों के लिए सन्तोप, धनलाभ और ऐश्वर्य दायिनी है और धर्म में पवृत्ति कराती है; क्योंकि अस्थि, मांस, नख, खाल और लोम ये पृथ्वी के गुण हैं। यदि सुगन्धित पुरुप हो तो बुधकृत पृथ्त्री की छाया मानना चाहिये ।।६४।। जलच्छायाल क्षण स्निग्धासिताच्छहरितानयनाभिरामा सौभाग्यमार्दवसुखाभ्युदयानकरोति। सर्वार्थसिद्धिजननी जननी च चाप्या छायाफलं तनुभृतां शुभमादधाति॥ ६५ ॥
- भारतीय सामुद्रिक यथार्थ में उन तत्चों पर अवलंवित है जिन पर सृष्टि निर्भर है। यह विषय बड़ा गम्भीर है। इसे हमने भूमिका में कहा है। तत्वों का पंचीकरण करके सृष्टिरचना की गई है। यही कारण है कि मृतक शरीर को अग्नि द्वारा पाँचों तत्वों में विभाजित कर देते है। यह महान् सिद्धान्त जिन २ विदेशी पंडितों की समझ में आ गया है वे आज भी भारतीय शास्त्रों का लोहा मानने में किंचित् संकोच नहीं करते। पर खेद है, आज कल हम भारतीय ही अपने गौरव को भुला रहे हैं। संपादक। यदि किसी के शरीर की शोभा चिकनी, सफ़ेद, साफ़ व सब्ज़ तथा नयनाभिराय हो तो उसे जल की छाया जानना चाहिये। यह सौभाग्य, कोमलता, सुख व ऐश्वर्य और माता के समान समग्र अर्थों की सिद्धि देती है। कारय, शुक्र, शोखित, गज्जा, मल और मूत्र ये पाँच जल के गुख हैं। यदि पाखी मिष्टरसभोजी हो तो चन्द्र-शुक्र-कृत जल की छाया माननी चाहिये॥। ६५ ।