37. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — अग्निच्छ्ायालक्षण
अग्निच्छ्ायालक्षण
चएडा घृष्या पद्महेमाग्निवर्णा युक्का तेजोविक्रमैः संप- तापैः। आग्नेयीति प्रापिनां स्याजयाय च्िपं सिद्धिं वाञ्छि तार्थस्य धत्ते॥ ६६ ॥ यदि शरीर की शोभा प्रचएड, भयजनक, कमल, सुवर्स अथवा अग्नि के समान प्रतापी हो तो उसे अग्नि की छाया जानना चाहिये। वह जय- दात्री है। शीघ्र ही वाञ्छित अर्थ की सिद्धि देती है। निद्रा, नुधा, प्यास, क्लान्ति और आलस्य ये अग्नि के गुण हैं। यदि पुरुप बहुत रूपवान् तथा सुकान्त हो तो सूर्य-भौमकृत आग्नेयी छाया जाननी चाहिये।। ६६ ॥