38. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — वाय्ाकाशच्छायालक्षण
वाय्ाकाशच्छायालक्षण
मलिनपरुषकृष्णा पापगन्धानिलोत्था जनयति वधबन्धव्याध्यनर्थार्थनाशान्। स्फटिकसदशरूपा भाग्ययुक़कात्युदारा निधिरिव गगनोत्था श्रेयसां स्वच्छवर्णा॥ ६७ ।। यदि शरीर की शोभा मैली, कठोर, काली तथा दुर्गन्धित हो तो उसे वायु की छाया जानना चाहिये। यह वध, बन्ध, व्याधि, अनर्थ व अर्थ- नाश करती है। धावन, चालन, नेपगा, संकोचन व प्रसारण ये ५ वायु के गुख हैं। यदि पाँवों का स्पर्शन कोमल हो तो शनैश्चरकृत वायवी छाया जाननी चाहिये। यदि शरीर की शोभा स्फटिकसदृश निर्मल हो तो आकाश की छाया जाननी चाहिये। यह भाग्यसूचक, औदार्यशाली तथा शुभदायक होती है। काम, क्रोध, लोभ, मोह व लज्जा ये पाँच आकाश के गुग' हैं। यदि पुरुष के वचन कानों को सुखकारी हों तो गुरुकृत नाभसी छाया माननी चाहिये।। ६७ ।।