40. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — स्वरलक्षण
स्वरलक्षण
गर्दभजर्जररूक्षस्वराश्च धनसौख्यसंत्यक्ाः ॥६६ ॥ १ ईश्वर उवाच। अस्थि मांसं नखं चैव त्वग्लोमानि च पञ्चमम्। पृथ्वयाः पञ्चगुणाः प्रोक्का ब्रह्मज्ञानेन भापते १ शुक्कं शोणितमज्ेच मलमूत्रं च पञ्चमम्। अपां पञ्चगुणा प्रोक्का ब्रह्मज्ञानेन भापते २ निद्रा त्ुधा तृषा क्लान्तिरालस्यं चैव पञ्चमम्। तेजः पञ्चगुणाः प्रोक्का ब्रह्मज्ञानेन भापते ३ धावनं चालनं क्षेप: संकोचं प्रसरन्तथा। वायो: पञ्चगुणाः प्रोक्का ब्रह्मज्ञानेन भापते ४ कामः क्रोधस्तथा मोहो लजा लोमश्च पञ्चमम्। नमः पंचगुणाः प्रोक्ता ब्रह्मज्ञानेन भाषते ५। ( इति ज्ञानसंकलिनीतन्त्रे) । सामुद्रिक शास्त्र ज्योतिष का एक अरंग है और ज्योतिप वेद का अंग है। वेदों में जिन विषयों का उल्लेख हुआ है वे प्राशिमात्र की भलाई के लिए है, किसी एक देश अथवा जाति ही के लिए नहीं। हमारा सामुद्रिक शास्त्र भी इसी प्रकार है। इसका वैद्यक, ज्योतिप, सांख्य, वेदान्त आदि से घनिष्ठ संबंध है। संपादक। २ छायां महाभूतकृतां च सर्वेभिव्यअ्ञयन्ति स्वदशामवाष्य।क्क््वग्निवायय- म्वरजान् गुणांश्च नासास्यटकृत्वकूश्रवणानुमेयानिति (वृहज्ातके)॥ ३ गन्धो रसस्तथा रूपं स्पर्श: शब्दश्च पश्चम इति वेदान्तिनां मते पृथिव्या- गन्ध:, जलस्य रस:,अग्ने:रूपम्, वायो: स्पर्शः, आकाशस्य शब्दस्तन्मात्रा इति। जिसका शब्द हाथी, वैल, रथसमह, मेरी, मृदंग, सिंह और मेघ के समान हो वह राजा होता है। जिसका शब्द (कएठध्वनि) गधे के समान व जर्जर तथा रूखा हो वह धन व सुखों से रहित होता है।। ६६ ।।