Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

44. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — अस्थिगुक्रसारलक्षण

अस्थिगुक्रसारलक्षण

स्थूलास्थिरस्थिसारो बलवान् विद्यान्तगः सुरूपश्र। बहुगुरुशुका: सुभगा विद्वांसो रूपवन्तश्च ॥ ३ ॥।

  • स्वरशास्त्र एक स्वतंत्र शास्त्र है। सप्त स्वर तमाम वायुमरडल में शब्द आदि नामों से मरे है। वर्तमान विज्ञानाचायों ने शब्द अथवा ध्वनि को सातों स्वरों में विभाजित कर पुनः क्रम से एकत्र करना यंत्रों द्वारा सरल कर दिया है। इसी का फल "रेडियो" है। प्थमखएड जिसके शरीर की इड्डियाँ मोटी हों उसमें अस्थि का सार जानना चाहिये। बह बली, विद्वान और रूपवाला होता है। जिनके शरीर में शुक्र व गुरु अधिक हो उनमें शुक्रसार जानना चाहिये। वे सौमाग्यशाली, विद्वान् तथा रूपवान् होते हैं# ॥ ३ ॥