46. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — स्निग्धलक्षण
स्निग्धलक्षण
स्नेहः पञ्चसु लच्यो वाग्जिह्वादन्तनेत्रनखसंस्थः । सुतधनसौभाग्ययुताः स्निग्धैस्तैनिर्धना रूकैः॥५ ॥ पाँच स्थानों में स्निग्धता देखनी चाहिये। यथा-वाक्य, जिह्वा, दन्त, नेत्र और नख। जिनके पाँचों स्थानों में स्निग्धता प्रतीत हो वे पुत्रवान्, धनवान् और भाग्यशाली होते हैं। जिनके पाँचों स्थान रूखे दिखें वे निर्धन होते हैं॥ ५ ॥