Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

50. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — महीजलस्वभावलक्षण

महीजलस्वभावलक्षण

महीस्वभावः शुभपुष्पगन्धः संभोगवान् सुश्वसनः स्थिरश्च। तोयस्वभावो बहुतोयपायी प्रियाभिलाषी रसभोजनश्च॥१३। जिसका स्व्रभाव पृथ्वी का सा हो तो उसके शरीर में उत्तम फूल के समान गन्ध आती है। वह बड़ा भोगनान् व अच्छी श्वासवाला होकर स्थिर रहता है। जिसका स्व्रमान जल के समान हो वह बहुत जल पीता व प्यारे की अभिलापा करना हुआ रसों को खाता है ॥ १३ ॥ अग्निवायुस्व भावल क्ष ण अग्निप्रकृत्या चपलोतितीचणश्चएडः तुधालुर्बहुभोजनश्च। वायो:स्वभावेन चलःकृशश्च त्िपं च कोपस्य वशं प्रयाति१४।। जिसका स्वभाव अरप्ररग्नि क समान हो तो वह चपल, बड़ा तीखा, कोपी तथा नु धावःन्और बहुन सोजन करता है। जिसका स्वभाव वायु के ममान हो वह चंचन वुद्धवाला, दुर्बल और जल्द गुस्से में आनेवाला होता है ॥ १४ ॥