53. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — रक्षःपिशाचलक्षण
रक्षःपिशाचलक्षण
तीकण प्रकोप: खलचेष्टितश्च पापश्च सत्त्वेन निशाचराणाम्ं। पिशाचसत्त्वश्चपलो मलाक्को बहुमलापी च समुल्वणाङ्ः।१७।। राक्षसों के समान स्वमाववाला, तीखे कोपवाला व खलों के समान चेष्टा रखनेवाला पापी होता है। जिसका स्वभाव पिशाच के समान हो वह चपल, मैला, बकवादी तथा बड़े डील डौलवाला होता है॥ १७ ॥ भीरु:चुधालुर्वह्ुभुक् चयः स्याज्ज्ञेयः ससत्वेन नरस्तिरश्चाम्। पशुसत्वल क्ष ण एवं नराणां प्रकृतिः प्रदिष्ट यल्लक्षणज्ञाः प्रवदन्ति सत्त्वम्॥१=॥ जिसका स्व्भाव पगुओं के समान हो उसको डरपोक, सुधार्त व बडुमोजी जानना चाहिये।। १= ।। शार्दूलहंससमदद्विपगोपतीनां तुल्या भम्ति गतिभि: