Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

56. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — मत्स्यादि चिह्नयुतपादजङ्गादिलक्षण

मत्स्यादि चिह्नयुतपादजङ्गादिलक्षण

मृदुतलौ चरणौ प्रशस्तौ। जङ्गे च रोमरहिते विशिरे सुवृत्ते जानुद्वयं सममनुल्वणसन्धिदेशम् ॥ ३ ॥ ऊरू घनों करिकरप्रतिमाव- रोमावश्वत्थपत्रसदशं विपुलं च गुह्यम्। श्रोणीललाटमुरुकूर्म- समुन्नतं च गूढो मणिश्च विपुलां श्रियमादघाति॥४॥ कोमल व पसीनासहित चरशातल, जिनमें मछली, अंकुश, कमल, यव, वज्च, हल और तलवार के चिह्न हो, नारी के ऐमे चरख प्रशस्त होते हैं। जंघाएँ रोमरहित, नस विहीन और गोलाकार हों। दोनों घुटने समान होकर सन्धिदेश में मांसल हो। दोनों ऊरू घने व हाथी की सूँड़ के समान हों तथा रोम रहित हों। गुद्याङ्ग पीपलपत्र के समान विस्तीर्ण हो। कमर तथा ललाट चौड़े कछुए के समान ऊँचे हों। मखि छिपी हो। वह नारी बड़ी संपत्तिशालिनी होती है।। ३ । ४ ।।