6. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — लिङ्ग और वृपण के लक्षण
लिङ्ग और वृपण के लक्षण
कोपनिगूढैर्भूपा दीर्घभग्नैश्च वित्तपरिहीना: । ऋजुबृत्तशेफसो लघुशिरालशिश्नाश्र धनवन्तः ॥ १३ ॥ जल गृत्युरेकवृषणो विषमैः स्त्रीचञ्चलः समैश्च चितिपः । इस्वायुश्रोद्दद्धैः प्रलभ्ववृषणस्य शतमायुः॥१४॥ रक्कैराव्या मणिभिनिर्द्व्या: पाएडुरैश्र मलिनैश्र। सुखिनः सशब्दमूत्रा निःस्त्रा निःशब्दधाराश्र॥१५॥ जिनके अएडकोप छिपे हों यानी मांस से घिरे हों, वे मनुष्य पृथ्वी- पति होते हैं। जिनके कोप लम्बे तथा ढीले हों वे धनहीन रहते हैं। जिनका लिङ्ग सीधा गोलाकार अथवा छोटा-सा होकर नसों से व्याप्त हो वे धनी होते हैं। जिसके एक ही अएडकोप हो वे जल में मौत पाते हैं। जिसके वृषण विपम होते हैं वह स्त्रियों में चञ्चल रहता है। जिसके दृपण सम होते हैं वह राजा होता है। जिसके वृपण ऊपर को उठे हों वह अल्पायु होता है। जिसके वृपण बड़े लम्बे होते हैं वह सौ बरस की आयु पाता है। जिनके लिङ्र की मखियाँ लाल हों वे धनवान् होते हैं। जिनके लिङ्ग की मखियाँ पीली वा मैली हों वे दरिद्री होते हैं। जिनके पेशाव करने में शब्द होता है वे सुखी रहते हैं। जिनकी मूत्र-धारा में शब्द न होता हो वे दरिद्री होते हैं ॥ १३-१५ ।।