7. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — मूत्रधारा, मणि, बस्ति और शुक्रगन्ध के लक्षण
मूत्रधारा, मणि, बस्ति और शुक्रगन्ध के लक्षण
एकैव मूत्रधारावलिता रूपप्रधानसुतदात्री। स्निग्घोन्नतसममणयो धनवनितारत्रभोक्कारः॥ १७॥ मणिभिश्च मध्यनिम्नैः कन्यापितरो भवन्ति निःस्वाश्च। बहुपशुभाजो मध्योन्नतैश्च नात्युल्वणैर्घनिनः ॥१८॥ परिशुष्कवस्तिशीर्षैर्धनरहिता दुर्भगाश्च विज्ञेयाः। कुसुमसमगन्धशुक्रा विज्ञातव्या महीपालाः ॥ १६ ॥ मधुगन्धे बहुवित्ता मत्स्यसगन्धे बहून्यपत्यानि। दनुशका स्त्रीजनको मांससगन्धो महाभोगी॥ २० ॥ मदिरागनधे यज्वा च्ारसगन्धे च रतसि दरिद्रः । शीघ्रं मैथुनगामी दीर्घायुरतोऽन्यथाऽल्पायुः॥२१॥ जिनके एक ही मूत्रधारा चलती है वह उनको रूप, पधानता व पुत्र देती है। जिनके लिङ्र का अग्रभाग चिकना, ऊँचा, और सम हो वे धन व स्त्रीरत्न के भोगनेवाले होते हैं। जिनकी मणियाँ बीच में गहरी हों वे कन्याओं के पिता और दरिद्री होते हैं। जिनकी मखियाँ बीच में ऊँची हों वे पशुपालक होते हैं। जिनकी मखियाँ बडुन ऊँची न हों वे धनी होते हैं। जिनके पेड़ व शिर सूंखे हों तो उनको विशेपता से दरिद्री जानना चाहिये। जिनके वीर्य में फूल की-सी गन्ध आती हो, उन्हें राजा जानना चाहिये। जिनके वीर्य में शहद-सी गन्ध हो वे बड़े धनी होते हैं। जिनके शुक्र में मछली-सी गन्ध हो वे बहुत-सी सन्तान पाते हैं। जिसे थोड़ा-सा वीर्य होता है वह कन्या उपजाता है। जिसके वीर्य में मांससी गन्ध हो, वह महाभोगी, जिसके वीर्य में मदिरा-सी गन्ध आती हो, वह विधि से यज्ञ करनेवाला होता है। जिसके वीर्य में चार-सी गन्ध हो, वह दरिद्री होता है। जिसके मैथुन करने में शीघ्रता होती हो, तो वह पाणी दीर्घायु होता है। जिसके मैथुन करने में बड़ी देर लगती हो, तो उसे थोड़ी उम्रवाला जानना चाहिये॥ १७-२१ ॥