Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

65. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — परमायुर्लक्षण

परमायुर्लक्षण

कनिष्ठिकामूलभवा गता या प्रदेशिनी मध्यमिकान्तरालम्। करोति रेखा परमायुषः साप्रमाणमूना तु तदूनमायुः ॥१४। जिन स्त्रियों के करतल में कनिप्ठ अंगुली के मल से निकली रेखा तर्जनी व मध्यमा के बीच तक हो तो वह उन्हें दीर्ायु करती है, और जो प्रमाण से कम हो तो कम आयु को देती है ॥ १४॥ अंगुष्ठ मूल रेखाज्ञान अंगुष्ठमूले प्रसवस्य रेखा पुत्रा बृहत्यः प्रमदास्तु तन्व्यः। अच्छिन्नदीर्घा बृहदायुपां ता अल्पायुषां चिन्नल घुपमाणाः १५ स्त्रियों के अँगूठे के मूल में सन्तान की रेखायें होती हैं। उनमें जो बड़ी हों वे पुत्र की रेखा जानना चाहिये। जो छोटी हों वे कन्याओं की जानना चाहिये। जो रेखाएँ साफ़ और बड़ी हों वे दीर्घायु द्योतक हैं। जो छ्िन्नभिन्न तथा छोटी रेखा प्रतीत हों वे कम उमरवालों की कहाती हैं॥ १५॥ इतीदमुक्कं शुभमङ्गनानामतो विपर्यस्तमनिष्टमुक्कम्। विशेषतोऽनिष्टफलानि यानि समासतस्तान्यनुकीर्तयामि१६ इस प्रकार जो स्त्रियों के शुभ लक्षण कहे हैं उनसे विपरीत अनिष्टदायक हैं। इसलिए विशेषतः जो अनिष्टफलदायक हैं उन्हें संक्षेप से कहता हूँ॥१६॥ पादाङ्कुलिल क्षणण कनिष्ठिका वा तदनन्तरा वा महीं न यस्या: स्पृशती स्त्रियाः स्यात। गताथवांगुष्ठमतीत्य यस्याः प्रदेशिनी सा कुलटाऽतिपापा॥ १७॥ जिस स्त्री के चलने में पैर की कनिष्ठा व अनामिका अंगुली पृथ्वी का स्पर्श न करें अथवा जिस स्त्री के पैर की तर्जनी अंगुली अँगूठे से लंबी हो वह स्त्री व्यभिचारिखी होती है॥। १७ ।। पिषिड कोद रलक्षग उद्बद्धाभ्यां पिरिडकाभ्यां शिराले शुष्के जङ्गे रोमशे चातिमांसे। वामावरत निम्नमल्पं च गुह्यं कुम्भाकारं चोदरं दुःखितानाम्॥१८॥ जिन स्त्रियों की पिंडुरियाँ ऊँची हों, जङ्गायें लोमोंवाली, अतिमांसल, या सूखी अथवा नसों से व्याप्त हो अर्थात् नसें दिखती हों, जिनका गुद्यदेश वामावर्त, गडरा व छोटा सा प्रतीत हो और उदर घड़ा सा हो वे स्तिरियाँ दुःखभागिनी होती हैं॥ १८ ॥ सामुद्रकशास्त्न