73. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — प्रदेशिन्यादिलक्षण
प्रदेशिन्यादिलक्षण
प्रदेशिनी भवद्यस्या अङ्गपादतिरेकिणी। कन्यैव कुलटा तु स्यादेष एव विनिश्चयः ॥ २२ ॥ राजित्वसूचकं स्त्रीणां पादपृष्ठं समुन्नतम्। स्निग्धा समुन्नतास्ताम्रा बृत्ता: पादनखाःशुभाः॥२३।। जिसके पैर की तर्जनी अंगुली अँगूठे से बढ़ी हो वह कन्या अवस्था में ही पुंश्चली हो जाती है। यदि ख्रियों के पैर की पीठ ऊँची हो तो वह रानी के पद को सूचित करती है। पैरों के नख चिकने, ऊँचे तथा ताम्र- वर्ण सराखे गोलाकार हों तो वे शुभदायक होते हैं ॥ २२।२३।।