74. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — पादपृष्ठमध्यनम्रादिलक्षण
पादपृष्ठमध्यनम्रादिलक्षण
राजित्वसूचकं स्त्रीणं पादपृष्ठं समुन्नतम्। अस्वेदमशिराव्यं च मसृणं मृदु मांसलम् ॥ २४॥ दरिद्रा मध्यनग्रेण शिरालेन सदाध्वगा। रोमाव्येन भवेदासी निमांसेन च दुर्भगा॥२५॥ यदि स्त्रियों के पैर की पीठ ऊँची, पसीना-रहित, नस-विहीन, चिकनी, कोमल और मांमयुक हो नो रानीपद को सूचित करनी है। जिसके पैर की पीठ बीच में लचीहो वह दरिद्राहोनी है। जिसके पैर की पीठ नसों से व्याप्त हो वह सदैव मार्ग में गमन करती है। जिमके पैर की पीठ रोमोंवाली हो वह दासी होती है और जिसके पैर की पीठ मांस से रहित हो वह स्त्री वुरे भाग्यवाली होती है ॥।२४।२५।