80. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — नामिलक्षण
नामिलक्षण
गम्भीरा दक्िणावर्ता नाभी स्यात्सुखसंपदे। वाभावर्ता समुत्ताना व्यक्तग्न्थिर्न शोभना॥। ४५॥ सूते सुतान्बहूनारी पृथुकुन्तिः सुखास्पदम्। च्ितीशं जनयेत्पुत्रं मराडूकाभेन कुचिणा॥ ४६ ॥ गहरी, रोम या रेखाओं से दहिनावर्त नाभि सुख संपदा के लिये होती है। जो नाभि बदुत ऊँची वामावर्त हो, जिसका मध्यभाग दिखता हो वह अ्शुभ- दायक होती है। जिसकी कोख चौड़ीसी हो वह स्त्रीबहुत से पुत्र पैदा करती है। जिसकी कोख मेंढक के उदरसमान हो वह सुखधाम, पृथ्वीपालक पुत्र की माता होती है।। ४५-४६॥। १ नाभि: प्रशस्ता गंभीरा दक्षिसावर्तिका शुभा। मत्स्योदरा बहुधना ना- भिभि: सुखिनः स्मृताः ॥ विस्तीर्णाभिर्यहुलाभिर्निम्नाभि: क्लेशभोगिनः । वलिमध्यगता नाभि: शलबाधां करोति हि। वामावर्ता च साध्यं वै मेधां च दत्षिरास्तथा। पार्श्वायता चिरायुः स्याद्भूपरिष्ठाद्धनेश्वरः ॥ अ्रधोगवाळ्य कुर्याञ्च नृपत्वं पझ्मकर्णिका। सामुद्रकशाख