Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

85. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — रोमराज्यादि लक्षण

रोमराज्यादि लक्षण

कपिला कुटिला स्थूला विच्छिन्ना रोमराजिका। चौर्यवैधव्यदौर्भाग्यं विदध्यादिह योषिताम्॥ ५४॥ निर्लोमहृदयं यस्या: समं निम्नत्ववर्जितम्। ऐश्वर्यं चाप्यवैधव्यं प्रियग्रेम च सा लभेत्॥ ५ ५॥ जिसकी रोमपंक्ि कपिलवर्णवाली, टेदी, मोटी, छिन्न-भिन्न-ती हो वह चोर, विधवा और बुरे भाग्यवाली होती है। जिसका हृदय रोम-रहित, सम हो वह ऐश्वर्य भोगती तथा अपने प्यारे की प्रेमपात्री होती है॥५४-५५॥