Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

86. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — हृदयलक्षण

हृदयलक्षण

विस्तीर्णहृदया योषा पुंश्चली निर्दया तथा। उद्धिन्नरोमहृदया पतिं हन्ति विनिश्चितम् ॥ ५६ ॥ अष्टादशाङ्गलततमुरः पीवरमुन्नतम्। सुखाय दुःखाय भवेद्रोमशं विषमं पृथु॥५७॥ जिसका हृदय विस्तारवाला हो वह स्त्री पुंश्चली और दयाहीन होती है। जिसके हृदय में रोम हों वह निश्चय ही पतिनाशक है। स्रत्रियों का अट्ठारह अंगुल चौढ़ा, मोटा और ऊँचा वन्तःस्थल सुखदायक होता है। रोमयुक्तक,विपम, चौड़ा वत्तःस्थल दुःखदायक होता है॥ ५६-५७॥ १ समयक्षा द्ि भोगाठ्या निम्नवक्षा धनोज्भिता। विस्तीर्णहृदया योपा पुंश्चली निर्दया तथेति।