87. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — स्तनलक्षण
स्तनलक्षण
घनौ वृत्तौ दृढौ पीनौ समौ शस्तौ पयोधरौ। स्थूलाग्रो विरलौ शुष्कौ वामोरूणां न शर्मदौ ॥| ५८ ॥ दोनों स्तन कठोर, गोल, दृद, स्थूल समान हों तो शुभदायक होते हैं। स्तनों के अग्रभाग मोटे, बिरते, सूखे हों तो सुखदायक नहीं होते॥ ५८ ॥ दक्िषोन्नतवत्तोजा पुत्रिणी त्वग्रणीर्मता। वामोन्नतकुचा सूते कन्यां सौभाग्यसुन्दरीम्॥ ५६॥। अरघट्टघटीतुल्यौ कुचो दौश्शील्यसूचकौ। पीवरास्यौ सान्तगलौ पृथूपान्तौ न शोभनौ ॥ ६०॥ जिसका दाहना स्तन ऊँचा हो वह स्त्री पुत्रवती होती तथा श्रेष्ठ मानी जाती है। जिसका बायाँ स्तन ऊँवाहो वह सौमाग्यसुन्दरी कन्या उप- जाती हैं। दोनों स्तन रहट के समान हों तो वे वुरे स्वभाव को सूचित करते हैं। जिन स्तनों के मुख मोटे हो, फ़ासिले पर हों, किनारे पर चौड़े हों वे शुभदायक नहीं होते॥ ५६-६० ॥ चूनकलत्तण मूले स्थूलौ क्रमकृशावग्रे तीच्णौ प्योधरौ। सुखदौ पूर्वकाले तु पश्चादत्यन्तदुःखदौ ॥६१॥ सुदृढं चूचकयुगं शस्तं श्यामं मुवर्तुन्तम्। अन्तर्मग्नं च दीर्घ च कृशं क्लशाय जायते ॥६२॥ स्नन मूल में मोटे नथा क्रप मे पनले हों, अग्रभाग में तीखे हो तो पहले सुखदायक होकर पीछे बड़े ही दुःखदायक होते हैं। स्तनों के अग्रभाग मजबूत, काले, बहुत गोल हों तो शुभदायक होते हैं। जो स्तनो के अग्रभाग (ढेपुनी) मीतर छिपे हों, दीर्घ हों, पतले हों, तो क्लेशदायक होते हैं ॥ ६१-६२॥ पीवराभ्यां च जत्रुभ्यां धनधान्यनिधिर्वधूः । श्लथास्थिम्यां च निम्नाभ्यां विषमाभ्यां दरिद्रिणी ॥६३।। अबद्धावनतौ स्कन्धावदीर्घावकृशौ शुभौ। वक्रौ स्थूचौ न रोमाढ्यौ प्रेष्यवैधव्यसूचकौ॥ ६४॥ जिसकी हँसलियाँ मोटी हो वह स्त्रो धन धान्य की निधि होती है। जिसकी हँसलियाँ ढीली इड्डियोंवाली, गहरी और विषम हो वह दरिद्रिणी होती है। यदि कन्धे बँधे या झुके हुए न हों, लम्बे या पतले न हों तो वे शुभदायक होते हैं। यदि कन्धे टेढ़े, मोटे, रोमयुक् हों वे दासी और विधवापन सूचित करते हैं ॥ ६३-६४ ॥