Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

90. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — भृजालक्तण

भृजालक्तण

विशिरौ च विरोमाणौ सरलौ हरिणीदृशाम् ॥६७॥ वैधव्यं स्थूलरोमाणौ इस्वौ दौर्भाग्यसूचकौ। परिक्लेशाय नारीणां परिदृश्यशिरौ भुजौ ॥ ६८ ॥ सामुद्रकशासत यदि रमणियों की भुजाएँ छिपी हुई इड्डियों व गाँठोंवाली, कोमल हों तथा नसों या रोमरहित, सीधी हों तो वे दोषकारक नहीं। जिन- की भुजाएँ मोटे रोमोंवाली हों वे ख्रियाँ विधवा होती हैं। जो भुजाएँ छोटी हों वे बुरे भाग्यको सूचित करती हैं। जो भुजाएँ चारों तरफ़ नसों से घिरी हों तो दुःखदायक होती हैं॥ ६७-६=॥ करानुष्ठलन्त ए हस्तदयं मृगाच्ीणां बहुभोगाय जायते॥ ६६॥ मृदु मध्योन्नतं रक्नं तलं पाएयोररन्धूकम्। प्रशस्तं शस्तरेखाव्यमल्परेखं शुभश्रियम् ॥७० ॥ यदि नारियों के दोनों हाथ, अँगूठे, और अङ्गलियों के सामने फूलती कमलकली के आकार के घने हों तो भोगदायक होते हैं। करतल कोमल, बीच में ऊँचा, लालवर्ण, छिद्ररहित, समीचीन रेखाओं से युक्क हो तो शुभ- दायक होता है। यदि करतल अल्परेखायुक़क हो तो शुभ और लक्ष्मी देता है॥ ६६-७० ॥