Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

91. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — पाितलपृष्ठलक्षण

पाितलपृष्ठलक्षण

विधवा बहुरेखेण विरेखेण दरिद्रिणी। भिच्तुकी सुशिराब्येन नारी करतलेन वै॥ ७१॥ विरोमविशिरं शस्तं पाणिपृष्ठं समुन्नतम्। वैधव्यहेतुं रोमाढ्यं निर्मांसं स्नायुमत्त्यजेत् ॥७२॥ हाथ में बहुत रेखावाली स्त्री विघना होती है। जिसका करतल रेखारहित हो वह दरिद्रिरी होती है। जिप्का करतल बडुतसी नसों से घिरा हो वह भीख माँगनेवाली होती है। जो हाथ की पीठ रोमों व नसों से रहित ऊँची हो वह शुभदायक होती है। जो हाथ की पीठ रोमों से संयुत, मांसरहित, नसों- वाली हो तो वह वैधव्य का कारण होती है। उसे त्याग दे।। ७१-७२॥ कररेखावर्णज्ञान रक्का व्यक्ना गभीरा च स्निग्धा पूर्ण च वर्तुला। कररेखाङ्गनायाः स्याच्छुभा भाग्यानुसारतः॥७३ ॥ पथमखएड मत्स्येन सुभगा नारी स्वस्तिकेन वसुप्दा। पद्मेन भूपतेः पत्नी जनयेडूपति सुतम्॥७४॥ यदि हाथ की रेखा लाल, स्पष्ट, गंभीर, चिकनी और पूरी २ गोल हो तो शुमदायक है। जिसके हाथ में मछली की रेखा हो वह स्त्री बढ़े भाग्य- वाली होती है। हाथ में त्रिकोखकार रेखा हो तो वह धनदायक है। जिसके हाथ में पद्म का निशान देखे वह रानी और पृथ्वीपालक पुत्र की माता होती है।। ७३-७४।। कर तलत्रिकोणदिचिह्न चक्रवर्तिस्तियाः पाणौ नन्द्यावर्तः प्रद्िणः। शङ्गातपत्रकमठा नृपमातृत्वसूचकाः॥ ७५॥ तुलामानाकृती रखे वणिक्पत्नीत्वहेतुके। गजवाजिवृषाकार करे वामे मृगीदशाम् ॥७६॥ जिसके हाथ में दाहिनी तरफ़ त्रिकोणकार रेखा हो वह स्त्री चक्रवर्ती की रानी होती है। जिनके हाथ में शंख, छाता, या धनुप के आकार की रेखा हों वे स्त्रियाँ राजमाता होती हैं। जिसके हाथ में तराजू व बाँटों की रेखा हों वह बिना कारण बनिये की पत्नी होती है। जिन रमणियों के बायें हाथ में हाथी, घोड़े या वैल के आकार की रेखा,।। ७५-७६ ।। रेखा प्रासादवज्राभा सूयुस्तीर्थकरं सुतम्। कृषीवलस्य पत्री स्याच्छकटेन युगेन वा ॥७७॥ चामराङ्कशकोदएडै राजपत्री भवेद्ध्रुवम्। अद्श्ठमूलान्निर्गत्य रेखा याति कनिष्ठिकाम् ॥७८ ॥ यदि सा पतिहन्त्री स्याद दूरतस्तां त्यजेद्बुधः। तथा देवमन्दिर या राजमहल, अथवा वज्र के समान रेखाएँ हों वे तीर्थाटनकारी पुत्र उत्पन्न करती हैं। जिसके हाथ में गाड़ी या जुएँ की रेखा हो वह किसान को प्यारी होती है। जिसके हाथ में चमर, अंकुश या धनुप के समान रेखा हों वह निश्चय ही रानी होती है। यदि अँगूठे के मूल से रेखा निकलकर कनिष्टिका अँगुली के पास चल्ी सामुद्रकशास्त्न जावे तो वह स्त्री पतिनाशक होती है। इसलिए विद्वान लोग उसको दूर ही से त्याग दें॥ ७७-७८॥ करतल त्रिशूलादिचिह्न नितंबिनी कीर्तिमती त्यागेन पृथिवीतले। कङ्कजम्बूकमराडूकवृ कवृश्चिकभोगिनः ॥८० ॥ रासभोष्ट्रविडाला: स्युः करस्था दुःखदाः स्तियाः । जिसके हाथ में त्रिशून, तलवार, गदा, शेल या नगाड़े के आकार की रेखाएँ हों वह स्त्री पृथ्ीमएडल में दान द्वारा कीर्निभागी होती है। उजली चील्ह, सियार, मेढक, भेड़िया, बीह्, साँप, गधा, ऊँट या बिलार के समान रेखाएँ दुःखदायक होती हैं॥ ७६-८० ॥ शुभदः सरलोङगष्ठो वृत्तो वृत्तनखो मृदुः ॥८१॥ अङ्गल्यश्च सुपर्वाणो दीर्घा वृत्ताः शुभा: कृशाः। चिपिटा: स्थपुटा रूक्षा पृष्ठरोमयुजोऽशुभाः ॥८२। अतिहस्वाः कृशा वक्रा विरला रोगहेतुकाः । दुःखायाङ्गुलयः स्त्रीणां बहुपर्वसमन्विताः ।=३।। सीधा, गोल या गोल नखोंवाला, कोमल अँगूठा सत्री को शुभदायक होता है। यदि अँगुलियाँ सुन्दर पोरोंवाली, लम्बी, गोल, क्रम से पतली हों तो शुभदायक होती हैं। चपटी या छोटी, गहरी या रखी अंगुली तथा रामयुक्त पीठ अशुमदायक होती हैं। बहुत छोटी, पतली या टेढी या बिरली अंगुली रोगदायर हैं। अगर अंगुलियाँ चौड़े पोरवाली हों तो दुःखदायक होती हैं॥ ८१-८३ ॥ नखलक्षण अरुणा: सशिखास्तुद्गाः करजा: सुदृशां शुभाः । निम्ना विवर्णा शुक्त्याभा: पीता दारिद्रयसूचका: ८४ नग्वेषु विन्दवः श्वेता: प्रायः स्युः स्वैरिणीब्नियाः। पुरुषा अपि जायन्ते दुःखिनः पुष्पितैर्नखैः ॥ ८५॥ यदि रमणियों के नख रक्वर्ण, शिखा सपेत, ऊँचे से हों तो शुभदायक होते हैं। गहरे, विवर्स या सीप सदश पीले नख दारिद्रय सूचित करते हैं। जिनके नखों में सफ़ेद बिन्दु (कौड़ी) हों वे मायः पुश्चली होती हैं। यदि पुरुषों के नखों में सफ़ेद चिह्न प्रतीत हो तो वे भी दुःखी ही होते हैं॥ ८४-८५ ॥* अन्तर्निमग्नवंशास्थिपृष्ठिः स्यान्मांसला शुभा। पृष्ठेन रोमयुक्केन वैधव्यं लभते ध्रुवम् ॥८६ ॥ अगर पीठ का वंश (बाँस) भीतर छिपा हो तथा पीठ माँस से भरीहो तो शुभदायक होती है। जिसकी पीठ रोमयुक्क हो वह स्त्री निश्चय कर वैधव्य पाती है॥। =६ ।।