92. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — कृकाटादिलक्षण
कृकाटादिलक्षण
भुग्नेन विनतेनापि सशिरेणापि दुःखिता। ऋज्वी कृकाटिका श्रेष्ठा समांसा च समुन्नता॥८७॥ शुष्का शिराला रोमाढ्या विशाला कुटिलाऽशुभा। मांसलो वर्तुलः करठः प्रशस्तश्चतुरह्गुलः ॥ ८८ ॥ टेढी, नसयुक्क, लचीसी पीठ दुःबदायक होती है। यदि घाँटी (उपजिद्दा) या घोंटा सीधी, मांसल, या ऊँचीसी हो तो शुभदायक होती है। यदि घाँटी सूखी, नसों से घिरी, रोम तथा चौड़ी या टेढी हो तो अगुभदायक है। यदि कएठ मांसल, गोल, या चार अंगुल का हो तो शुभदायक है॥। ८७-८2 ॥
- नखवर्णन देशी तथा विदेशी विद्वानों ने स्वतंत्र रूप से किया है। केवल नख ही देखकर विज्ञ पुरुष आचरण, स्वभाव एवं भूत-भविष्यत् बता देते है। सम्पादक।