Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

94. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — चिवुकलक्षण

चिवुकलक्षण

चिबुकं द्वयह्गुलं शस्तं वृत्तं पीनं सुकोमलम् । स्थूलं द्विधा संविभक्रमायतं रोमशं त्यजेत्॥ ६१ ॥ हनुश्चिबुकसंलग्ना निर्लोमा सुघना शुभा। वक्रा स्थूला कृशा इस्वा रोमशा न शुभप्रदा।। ६२॥ गोल, मोटी, बढ़ी, कोमल या दो अंगुलवाली चित्रुक (दाढ़ी) स्त्री के लिए शुभदायक है। जिसकी चियुक मोटी, दो भागों में बँटी, चौढ़ी या रोमोंवाली हो तो उसे दूर से ही त्याग दे। यदि हनु (डुड्डी) चिनुक में लगी हुई निर्लोम, बढ़ी या मजबून हो तो शुभदायक है। पर टेही, मोटी, पतली व छोटी, रोमोंवाली शुमदायक नहीं॥ ६१-६२॥