4. चतुर्थः खण्डः
चतुर्थः खण्डः
Verse १
हृदयस्य मध्ये लोहितं मांसपिण्डं यस्मिंस्तद्दहरं पुण्डरीकं कुमुदमिवानेकधा विकसितं हृदयस्य दश छिद्राणि भवन्ति येषु प्राणा: प्रतिष्ठिताः॥
hṛdayasya madhye lohitaṃ māṃsapiṇḍaṃ yasmiṃstaddaharaṃ puṇḍarīkaṃ kumudamivānekadhā vikasitaṃ hṛdayasya daśa chidrāṇi bhavanti yeṣu prāṇā: pratiṣṭhitāḥ॥
In the midst of the heart, is a mass of red flesh in which is the Dahara of Lotus (in shape), blossoming in many ways like lily - there are ten holes in the heart where the vital airs are established. 2. When the (Jiva) is connected with Prana, then he sees rivers and cities of many kinds; when with Vyana, he sees Devas and Rishis; with Apana, Yakshas etc.; with Udana, the celestial worlds, gods, Skanda and Jayanta; with Samana, wealth also; with Vairambha (Prana) sees what is seen, heard, eaten and not eaten, visible and invisible. 3. Then these Nadis become hundred; from these, branch out seventy two thousand Nadis, in which the self sleeps and makes noises, in the second sheath he sleeps and sees this world and the other, hears all sounds - this they call clarity. Prana defends the body. The Nadis are filled with green, blue, yellow, red and white blood. 4. This Dahara lotus is blooming in many ways like a lily and like hair, so also the Nadis are placed in the heart. The divine self sleeps in the great sheath when there are no desires, no sleep even, there are no Devas or their worlds, Yagas, Mother, Father, kinsmen, no thieves or Brahmana-killer. All this is water - Again by the same path, he returns to wakefulness, this Samraj.
हृदय के मध्यभाग में रक्त वर्ण के मांस पिण्ड के बीच वह सूक्ष्म आत्म-तत्त्व विद्यमान है। वह कुमुद (रात्रि में विकसित होने वाले कुमुद पुष्प) के समान श्वेतवर्ण वाला और अनेक प्रकार से विकसित हुआ है। हृदय में दस छिद्र होते हैं, जिनके अन्दर प्राण निवास करते हैं॥ [ऋषि स्थूल हृदय के मध्य में स्थित पिण्ड में आत्मतत्त्व के होने की बात कहते हैं। वर्तमान विज्ञान के अनुसार हृदय में स्थित पेसमेकर, के साथ इसकी संगति बैठती है। हृदय की धड़कन का मूल स्पंदन वही से उभरता है, जिसे जीव चेतना द्वारा उद्भूत स्पंदन ही कहा जा सकता है। हृदय में १० छिद्रों की बात स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों संदर्भों में सिद्ध होती है। हृदय की धड़कन के साथ प्राण संचरित होते हैं, ५ प्राण एवं ५उपप्राण कुल दस प्रकार के प्राणों का संचरण हृदयसे होता है, यह सृक्ष्म व्याख्या हुई। स्थल हृदय में भी १० छिद्र इस प्रकार पाये जाते हैं दाहिने ऑरिकल में शरीर के ऊपरी भाग से आने वाले रक्त का छिद्र सुपीरियर वैनाकोवा तथा २. नीचे से आने वाले के लिए इन्फीरियर वैनाकोवा ३. दाहिने आरि० से दाहिने वेंट्रिक्ल का छिद्र, ४, दायें वेंट्रिकल से फेफड़ों से रक्त जाने का मार्ग ‘ट्रंक्स’, ५,६. बायें फेफड़े से बाये आरि० में प्रवेश के दो मार्ग; ७,८, दायें फेफड़े से रक्त प्रवेश के दो मार्ग, १. बायें आरि० से बायें वेन्ट्रि० में रक्त जाने का मार्ग एवं १०, बायें वेंट्रिक्ल से शरीर पोषण के लिए रक्त से भेजने का मार्ग।]
Verse २
स यदा प्राणेन सह संयुज्यते तदा पश्यति नद्यो नगराणि बहूनि विविधानि च यदा व्यानेन सह संयुज्यते तदा पश्यति देवांश्च ऋषींश्च यदाऽपानेन सह संयुज्यते तदा पश्यति यक्षराक्षसगन्धर्वान्यदोदानेन सह संयुज्यते तदा पश्यति देवलोकान्देवान्स्कन्दं जयन्तं चेति यदा समानेन सह संयुज्यते तदा पश्यति देवलोकान्धनानि च यदा वैरम्भेण सह संयुज्यते तदा पश्यति दृष्टं च श्नुतं च भुक्तं चाभुक्तं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति ॥
sa yadā prāṇena saha saṃyujyate tadā paśyati nadyo nagarāṇi bahūni vividhāni ca yadā vyānena saha saṃyujyate tadā paśyati devāṃśca ṛṣīṃśca yadā'pānena saha saṃyujyate tadā paśyati yakṣarākṣasagandharvānyadodānena saha saṃyujyate tadā paśyati devalokāndevānskandaṃ jayantaṃ ceti yadā samānena saha saṃyujyate tadā paśyati devalokāndhanāni ca yadā vairambheṇa saha saṃyujyate tadā paśyati dṛṣṭaṃ ca śnutaṃ ca bhuktaṃ cābhuktaṃ ca saccāsacca sarvaṃ paśyati ॥
The heart of all smells is Earth, of tastes water, of forms fire, of touchless air, of sounds ether. Avyakta is the heart of all movements, Mrityu of all Sattvas (living beings). Death indeed becomes one with the supreme Deity. Beyond it there is neither being nor non-being nor their combination - this is the doctrine of Nirvana of the Vedas.
यह जीव (जाग्रदवस्था में) जब प्राण के साथ संयुक्त होता है, तब बहुत सी नदियों और विविध प्रकार के नगरों को देखता है। जब व्यान के साथ संयुक्त होता है, तब देवों और ऋषियों का दर्शन करता है। जब अपान के साथ संयुक्त होता है, तब यक्ष, राक्षस और गन्धर्वो का दर्शन करता है। जब उदान के साथ संयुक्त होता है, तब देवलोकों, देवों और जयन्त को देखता है। जब समान के साथ संयुक्त होता है, तब देवलोकों और धन का दर्शन करता है। जब वैरम्भ के साथ संयुक्त होता है, तब देखे हुए को, सुने हुए को, खाये हुए को, बिना खाये हुए को, सत् और असत् सभी को देखता है॥
Verse ३
अथेमा दश दश नाड्यो भवन्ति। तासामेकैकस्या द्वासप्ततिदर्वासप्ततिः शाखा नाडीसहस्त्राणि भवन्ति यस्मिन्नयमात्मा स्वपिति शब्दानां च करोत्यथ यद्वितीये से कोशे स्वपिति तदेमं च लोकं परं च लोकं पश्यति सर्वाञ्छब्दान्विजानाति स संप्रसाद इत्याचक्षते प्राणः शरीरं परिरक्षति हरितस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्य श्वेतस्य नाड्यो रुधिरस्य पूर्णाः ।।
athemā daśa daśa nāḍyo bhavanti। tāsāmekaikasyā dvāsaptatidarvāsaptatiḥ śākhā nāḍīsahastrāṇi bhavanti yasminnayamātmā svapiti śabdānāṃ ca karotyatha yadvitīye se kośe svapiti tademaṃ ca lokaṃ paraṃ ca lokaṃ paśyati sarvāñchabdānvijānāti sa saṃprasāda ityācakṣate prāṇaḥ śarīraṃ parirakṣati haritasya nīlasya pītasya lohitasya śvetasya nāḍyo rudhirasya pūrṇāḥ ।।
इस हृदय की दस-दस अर्थात् सौ नाड़ियाँ होती हैं। इनमें से प्रत्येक की बहत्तर-बहत्तर हजार नाड़ी शाखायें होती हैं। इस प्रकार हजारों नाड़ियाँ होती हैं, जिनमें यह आत्मा शयन करता है और शब्दों की क्रिया करता है। द्वितीय कोश में जब आत्मा शयन करता है, जब इह लोक और परलोक का दर्शन करता है, समस्त शब्दों को जानता है, उस स्थिति में इसे संप्रसाद कहते हैं। प्राण शरीर की रक्षा करता है। ये नाड़ियाँ हरित वर्ण, नीले, पीले, लाल और श्वेत वर्ण के रक्त से अभिपूरित हैं (अर्थात् वात, पित्तादि रसों से पूर्ण हैं)॥
Verse ४
अथात्रैतद्दहरं पुण्डरीकं कुमुदमिवानेकधा विकसितं यथा केशः सहस्त्रधा भिन्नस्तथा हिता नाम नाड्यो भवन्ति हृद्याकाशे परे कोशे दिव्योऽयमात्मा स्वपिति यत्र सुप्तो न कंचन कामं कामयते न कंचन स्वप्नं पश्यति न तत्र देवा न देवलोका यज्ञा न यज्ञा वा न माता न पिता न बन्धुर्न बान्धवो न स्तेनोन ब्रह्महा तेजस्कायममृतं सलिल एवेदं सलिलं वनं भूयस्तेनैव मार्गेण जाग्राय धावति सम्राडिति होवाच॥
athātraitaddaharaṃ puṇḍarīkaṃ kumudamivānekadhā vikasitaṃ yathā keśaḥ sahastradhā bhinnastathā hitā nāma nāḍyo bhavanti hṛdyākāśe pare kośe divyo'yamātmā svapiti yatra supto na kaṃcana kāmaṃ kāmayate na kaṃcana svapnaṃ paśyati na tatra devā na devalokā yajñā na yajñā vā na mātā na pitā na bandhurna bāndhavo na stenona brahmahā tejaskāyamamṛtaṃ salila evedaṃ salilaṃ vanaṃ bhūyastenaiva mārgeṇa jāgrāya dhāvati samrāḍiti hovāca॥
इस शरीर में स्थित सूक्ष्म हृदय कमल, रात्रि में खिलने वाले कुमुद के सदृश श्वेत वर्ण का है, जो अनेक प्रकार से विकास को प्राप्त हुआ है। एक बाल को हजार हिस्सों में चीर दिया जाए, इतनी पतली हिता नामक नाड़ियाँ होती हैं। हृदयाकाश परम कोश है, जिसमें यह दिव्य आत्म तत्त्व निवास करता है। जब यह निद्रा की अवस्था में होता है, तो किसी प्रकार की कामना नहीं करता और न ही कोई स्वप्न देखता है। वहाँ न कोई देवता है, न देवलोक है, न यज्ञ है, न उसकी क्रियाएँ हैं। उस स्थिति में (वह) ने माता है, न पिता है, न बन्धु है, न बान्धव है, न चोर है, न ब्रह्म हत्यारा है। वह (आत्मा) तेजस्वरूप है, अमृत है। जल ही जल है, वन के समान है। इस मार्ग से आत्मा जाग्नदवस्था की ओर दौड़ता है, सम्राट् (जिसका अन्त:करण ज्ञान से प्रकाशित हो चुका है, ऐसे अनुभूतिवान् व्यक्ति) ने ऐसा कहा है ॥