5. पञ्चमः खण्डः
पञ्चमः खण्डः
Verse १
स्थानानि स्थानिभ्यो यच्छति नाडी तेषां निबन्धनं चक्षुरध्यात्मं द्रष्टव्यमधिभूतमादित्य-स्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यश्चक्षुषि यो द्रष्टव्ये य आदित्ये यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मा-नमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम्॥
sthānāni sthānibhyo yacchati nāḍī teṣāṃ nibandhanaṃ cakṣuradhyātmaṃ draṣṭavyamadhibhūtamāditya-statrādhidaivataṃ nāḍī teṣāṃ nibandhanaṃ yaścakṣuṣi yo draṣṭavye ya āditye yo nāḍyāṃ yaḥ prāṇe yo vijñāne ya ānande yo hṛdyākāśe ya etasminsarvasminnantare saṃcarati so'yamātmā tamātmā-namupāsītājaramamṛtamabhayamaśokamanantam॥
In the midst of the heart, is a mass of red flesh in which is the Dahara of Lotus (in shape), blossoming in many ways like lily - there are ten holes in the heart where the vital airs are established. 2. When the (Jiva) is connected with Prana, then he sees rivers and cities of many kinds; when with Vyana, he sees Devas and Rishis; with Apana, Yakshas etc.; with Udana, the celestial worlds, gods, Skanda and Jayanta; with Samana, wealth also; with Vairambha (Prana) sees what is seen, heard, eaten and not eaten, visible and invisible. 3. Then these Nadis become hundred; from these, branch out seventy two thousand Nadis, in which the self sleeps and makes noises, in the second sheath he sleeps and sees this world and the other, hears all sounds - this they call clarity. Prana defends the body. The Nadis are filled with green, blue, yellow, red and white blood. 4. This Dahara lotus is blooming in many ways like a lily and like hair, so also the Nadis are placed in the heart. The divine self sleeps in the great sheath when there are no desires, no sleep even, there are no Devas or their worlds, Yagas, Mother, Father, kinsmen, no thieves or Brahmana-killer. All this is water - Again by the same path, he returns to wakefulness, this Samraj.
(इस प्रकार जाग्रत् आदि कोशत्रय में निवास करने वाला) आत्मा उन-उन स्थानों में रहने वालों को स्थान प्रदान करता है। नाड़ी उनका मूल साधन है। चक्षु अध्यात्म है। देखा जाने वाला (द्रष्टव्य) पदार्थ अधिभूत है और आदित्य अधिदैवत है। नाड़ी उसका मूल कारण है। जो चक्षु इन्द्रिय में, द्रष्टव्य पदार्थ में, आदित्य में, नाड़ी में, प्राण में, विज्ञान में, आनन्द में, हृदयाकाश में और इस सम्पूर्ण शरीर में संचरण करता है, यह आत्मा है। उस आत्मा की ही उपासना करनी चाहिए, जो अजर, अमर, अभय, अशोक और अनन्त है॥ [नाही को अध्यात्म, भधिभूत और अधिदैवत का मूलकारण कहा गया है। दृष्टि का विकास और विलय उससे सम्बद्ध नाड़ी में होता है, यह स्पष्ट है। जिस प्रकार आत्मा के स्थान शरीर में विभिन्न नाड़ियाँ हैं, वैसे ही अधिभूत के लिए प्रकृति में तथा अधिदैवत के लिए विराट् पुरुष में नाड़ियाँ हैं। आगे नवम खण्ड में स्पष्ट किया गया है कि आदित्य आदि भी उनसे सम्बद्ध विराट् नाड़ियों से ही उद्भूत और उन्हीं में विलीन होते हैं।]
Verse २
श्रोत्रमध्यात्मं श्रोतव्यमधिभूतं दिशस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यः श्रोत्रे यः श्रोतव्ये यो दिक्षु यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मि-न्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥
śrotramadhyātmaṃ śrotavyamadhibhūtaṃ diśastatrādhidaivataṃ nāḍī teṣāṃ nibandhanaṃ yaḥ śrotre yaḥ śrotavye yo dikṣu yo nāḍyāṃ yaḥ prāṇe yo vijñāne ya ānande yo hṛdyākāśe ya etasminsarvasmi-nnantare saṃcarati so'yamātmā tamātmānamupāsītājaramamṛtamabhayamaśokamanantam ॥
The heart of all smells is Earth, of tastes water, of forms fire, of touchless air, of sounds ether. Avyakta is the heart of all movements, Mrityu of all Sattvas (living beings). Death indeed becomes one with the supreme Deity. Beyond it there is neither being nor non-being nor their combination - this is the doctrine of Nirvana of the Vedas.
इसी प्रकार श्रोत्रेन्द्रिय भी अध्यात्म है, श्रोतव्य शब्द अधिभूत है और दिशाएँ अधिदैवत हैं। इन तीनों का मूल कारण नाड़ी है। श्रोत्र में, श्रोतव्य शब्द में, दिशाओं में, नाड़ी में, प्राण में, विज्ञान में, आनन्द में, हृदयाकाश में और सम्पूर्ण शरीर के अन्दर जो संचरित होता है, वह आत्मा है। इसी की उपासना करनी चाहिए। यह जरारहित, मृत्युरहित, भयरहित, शोकरहित और अनन्त है ॥
Verse ३
नासाध्यात्मं घ्रातव्यमधिभूतं पृथिवी तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो नासायां यो घ्रातव्ये यः पृथिव्यां यो नाड्यां .........नन्तम् ॥
nāsādhyātmaṃ ghrātavyamadhibhūtaṃ pṛthivī tatrādhidaivataṃ nāḍī teṣāṃ nibandhanaṃ yo nāsāyāṃ yo ghrātavye yaḥ pṛthivyāṃ yo nāḍyāṃ .........nantam ॥
(उपर्युक्त के समान ही) नासिका अध्यात्म है, घ्रातव्य (सूँघने के विषय) अधिभूत हैं और पृथिवी अधि दैवत है। नाड़ी उनका मूल स्थान है। जो नासिका में, घ्रीतव्य गन्ध में, पृथिवी में, नाड़ी में....अनन्त है ॥
Verse ४
जिह्वाध्यात्मं यो रसयितव्यमधिभूतं वरुणस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो जिह्वायां यो रसयितव्ये यो वरुणे यो नाड्यां ..........नन्तम् ॥
jihvādhyātmaṃ yo rasayitavyamadhibhūtaṃ varuṇastatrādhidaivataṃ nāḍī teṣāṃ nibandhanaṃ yo jihvāyāṃ yo rasayitavye yo varuṇe yo nāḍyāṃ ..........nantam ॥
(इसी प्रकार) जिह्वा अध्यात्म है, स्वादिष्ट पदार्थ अधिभूत हैं और वरुण अधिदैवत है। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो जिह्वा में, स्वाद लेने के रस में, वरुण में और नाड़ी में ..............अनन्त है ॥
Verse ५
त्वगध्यात्मं स्पर्शयितव्यमधिभूतं वायुस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यस्त्वचि यः। स्पर्शयितव्ये यो वायौ यो नाड्यां.................नन्तम्॥
tvagadhyātmaṃ sparśayitavyamadhibhūtaṃ vāyustatrādhidaivataṃ nāḍī teṣāṃ nibandhanaṃ yastvaci yaḥ। sparśayitavye yo vāyau yo nāḍyāṃ.................nantam॥
(इसी प्रकार) त्वचा अध्यात्म है, स्पर्श योग्य वस्तु अधिभूत है और वायु अधिदैवत है। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो त्वगिन्द्रिय में, स्पर्श किये गये पदार्थ में, वायु में और नाड़ी में, .....................अनन्त है ॥
Verse ६
मनोऽध्यात्मं मन्तव्यमधिभूतं चन्द्रस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो मनसि यो मन्तव्ये यश्चन्द्रे यो नाड्यां .........नन्तम्॥
mano'dhyātmaṃ mantavyamadhibhūtaṃ candrastatrādhidaivataṃ nāḍī teṣāṃ nibandhanaṃ yo manasi yo mantavye yaścandre yo nāḍyāṃ .........nantam॥
(इसी प्रकार) मन भी अध्यात्म है, मन्तव्य (मन का विषय) अधिभूत है, चन्द्रमा अधिदैवत है। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो मन में, जो मन्तव्य में, जो चन्द्रमा में, जो नाड़ी में .......................अनन्त है ॥
Verse ७
बुद्धिरध्यात्मं बोद्धव्यमधिभूतं ब्रह्मा तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो बुद्धौ यो बोद्धव्ये यो ब्रह्मणि यो नाडया........... नन्तम्॥
buddhiradhyātmaṃ boddhavyamadhibhūtaṃ brahmā tatrādhidaivataṃ nāḍī teṣāṃ nibandhanaṃ yo buddhau yo boddhavye yo brahmaṇi yo nāḍayā........... nantam॥
(इसी प्रकार) बुद्धि अध्यात्म है, बोद्धव्य (बुद्धि का विषय) अधिभूत है, ब्रह्मा अधिदैवत है और ‘नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो बुद्धि में, बोद्धव्य में, ब्रह्मा में, जो नाड़ी में .......................अनन्त है॥
Verse ८
अहंकारोऽध्यात्ममहंकर्तव्यमधिभूतं रुद्रस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं योऽहंकारे योऽहंकर्तव्ये यो रुद्रे यो नाड्यां.......................नन्तम्॥
ahaṃkāro'dhyātmamahaṃkartavyamadhibhūtaṃ rudrastatrādhidaivataṃ nāḍī teṣāṃ nibandhanaṃ yo'haṃkāre yo'haṃkartavye yo rudre yo nāḍyāṃ.......................nantam॥
अहंकार अध्यात्म है, अहंकर्तव्य (अहं का विषय) अधिभूत है, रुद्र अधिदैवत हैं और नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो अहंकार में, अहं के विषय में , रुद्र में, नाड़ी में ....................अनन्त है ॥
Verse ९
चित्तमध्यात्मं चेतयितव्यमधिभूतं क्षेत्रज्ञस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यश्चित्ते यश्चेतयितव्ये यः क्षेत्रज्ञे यो नाड्यां......... नन्तम् ॥
cittamadhyātmaṃ cetayitavyamadhibhūtaṃ kṣetrajñastatrādhidaivataṃ nāḍī teṣāṃ nibandhanaṃ yaścitte yaścetayitavye yaḥ kṣetrajñe yo nāḍyāṃ......... nantam ॥
(इसी प्रकार) चित्त अध्यात्म है, चेतयितव्य (चिन्तन का विषय) अधिभूत है, उसमें क्षेत्रज्ञ अधिदैवत है। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो चित्त में, चेतयितव्य में, क्षेत्रज्ञ में, नाड़ी में .......................अनन्त है॥
Verse १०
वागध्यात्मं वक्तव्यमधिभूतमग्निस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो वाचि यो वक्तव्ये योऽग्नौ यो नाड्यां..........नन्तम्॥
vāgadhyātmaṃ vaktavyamadhibhūtamagnistatrādhidaivataṃ nāḍī teṣāṃ nibandhanaṃ yo vāci yo vaktavye yo'gnau yo nāḍyāṃ..........nantam॥
(उपर्युक्त की तरह ही) वाक् (वाणी) अध्यात्म है, वक्तव्य अधिभूत है और अग्नि अधिदैवत हैं। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो वाणी में, वक्तव्य में, अग्नि में, नाड़ी में .........................अनन्त है ॥
Verse ११
हस्तावध्यात्ममादातव्यमधिभूतमिन्द्रस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो हस्ते य आदातव्ये य इन्द्रे यो नाड्यां..................नन्तम्॥
hastāvadhyātmamādātavyamadhibhūtamindrastatrādhidaivataṃ nāḍī teṣāṃ nibandhanaṃ yo haste ya ādātavye ya indre yo nāḍyāṃ..................nantam॥
(इसी प्रकार) दोनों हाथ अध्यात्म हैं, ग्रहणीय पदार्थ अधिभूत हैं, इन्द्र अधिदैवत हैं तथा नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो हाथ में, ग्रहण करने के विषय में, इन्द्र में, नाड़ी में ............. अनन्त है॥
Verse १२
पादावध्यात्म गन्तव्यमधिभूतं विष्णुस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यः पादे यो गन्तव्ये यो विष्णौ यो नाड्यां............ नन्तम्॥
pādāvadhyātma gantavyamadhibhūtaṃ viṣṇustatrādhidaivataṃ nāḍī teṣāṃ nibandhanaṃ yaḥ pāde yo gantavye yo viṣṇau yo nāḍyāṃ............ nantam॥
(इसी तरह) दोनों पैर अध्यात्म हैं, गन्तव्य अधिभूत है, विष्णु अधिदैवत हैं। नाड़ी इनका मूलस्थान है। जो पैर में, गन्तव्य में, विष्णु में, नाड़ी में...................अनन्त है॥
Verse १३
पायुरध्यात्मं विसर्जयितव्यमधिभूतं मृत्युस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यः पायौ यो विर्जयितव्ये यो मृत्यौ यो नाड्यां .................नन्तम्॥
pāyuradhyātmaṃ visarjayitavyamadhibhūtaṃ mṛtyustatrādhidaivataṃ nāḍī teṣāṃ nibandhanaṃ yaḥ pāyau yo virjayitavye yo mṛtyau yo nāḍyāṃ .................nantam॥
(उपर्युक्त जैसा) वायु (गुदा) अध्यात्म है, विसर्जयितव्य (विसर्जन करने का विषय) अधिभूत है और मृत्यु अधिदैवत है। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो गुदा में, विसर्जनीय में, मृत्यु में, नाड़ी में ...............अनन्त है ॥
Verse १४
उपस्थोऽध्यात्ममानन्दयितव्यमधिभूतं प्रजापतिस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं य उपस्थे य आनन्दयितव्ये यः प्रजापतौ यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम्॥
upastho'dhyātmamānandayitavyamadhibhūtaṃ prajāpatistatrādhidaivataṃ nāḍī teṣāṃ nibandhanaṃ ya upasthe ya ānandayitavye yaḥ prajāpatau yo nāḍyāṃ yaḥ prāṇe yo vijñāne ya ānande yo hṛdyākāśe ya etasminsarvasminnantare saṃcarati so'yamātmā tamātmānamupāsītājaramamṛtamabhayamaśokamanantam॥
इसी प्रकार उपस्थेन्द्रिय अध्यात्म है, आनन्दयितव्य (आनन्द का विषय) अधिभूत है और प्रजापति अधिदैवत हैं। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो उपस्थ (जननेन्द्रिय) में, जो आनंद के विषय में, जो प्रजापति में, जो नाड़ी में, जो प्राण में, जो विज्ञान में, जो आनन्द में, जो हृदयाकाश में और जो इस सम्पूर्ण शरीर में संचरित होता है, वही यह आत्मा है। इस आत्मा की ही उपासना करनी चाहिए। यह जरा रहित, मरण रहित, भयरहित, शोकरहित और अनन्त है ॥
Verse १५
एष सर्वज्ञ एष सर्वेश्वर एष सर्वाधिपतिरेषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य सर्वसौख्यैरुपा-स्यमानो न च सर्वसौख्यान्युपास्यति वेदशास्त्रैरुपास्यमानो न च वेदशास्त्राण्युपास्यति यस्यान्नमिदं सर्वे न च योऽन्नं भवत्यतः परं सर्वनयनः प्रशास्तान्नमयो भूतात्मा प्राणमय इन्द्रियात्मा मनोमयः संकल्पात्मा विज्ञानमय: कालात्यानन्दमयो लयात्मैकत्वं नास्ति द्वैतं कुतो मर्त्यं नास्त्यमृतं कुतो नान्तःप्रज्ञो न बहिःप्रज्ञो नोभयतःप्रज्ञो न प्रज्ञानघनो न प्रज्ञो नाप्रज्ञोऽपि नो विदितं वेद्यं नास्तीत्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमितिवेदानुशासनम् ॥
eṣa sarvajña eṣa sarveśvara eṣa sarvādhipatireṣo'ntaryāmyeṣa yoniḥ sarvasya sarvasaukhyairupā-syamāno na ca sarvasaukhyānyupāsyati vedaśāstrairupāsyamāno na ca vedaśāstrāṇyupāsyati yasyānnamidaṃ sarve na ca yo'nnaṃ bhavatyataḥ paraṃ sarvanayanaḥ praśāstānnamayo bhūtātmā prāṇamaya indriyātmā manomayaḥ saṃkalpātmā vijñānamaya: kālātyānandamayo layātmaikatvaṃ nāsti dvaitaṃ kuto martyaṃ nāstyamṛtaṃ kuto nāntaḥprajño na bahiḥprajño nobhayataḥprajño na prajñānaghano na prajño nāprajño'pi no viditaṃ vedyaṃ nāstītyetannirvāṇānuśāsanamiti vedānuśāsanamitivedānuśāsanam ॥
यह (तुर्यातिरिक्त) ईश्वर सर्वज्ञ है, यह सर्वेश है, सर्वाधिपति है, अन्तर्यामी है और यही सबका उत्पत्ति स्थान है। समस्त सुखों के द्वारा यही उपास्य है, पर यह समस्त सुखों की उपासना नहीं करता। यह वेद और शास्त्रों का भी उपास्य है, पर यह वेद और शास्त्रों की उपासना नहीं करता। सभी अन्न इसके हैं, पर यह किसी का अन्न नहीं है। इसके अतिरिक्त यह सभी का नेत्र, सब को आज्ञा देने वाला, अन्नमय भूतों (प्राणियों) की आत्मा, प्राणमय इन्द्रियों की आत्मा, मनोमय संकल्प स्वरूप, विज्ञानमय कालरूप, आनन्दमय और लयात्मक है। उसमें अद्वैत (एकत्व) नहीं है, तो द्वैत कहाँ हो सकता है? वह मर्त्य नहीं है, तो अमृत कैसे हो सकता है? वह न अन्तःप्रज्ञ है और नं बाह्यप्रज्ञ है। वह दोनों (अन्तर् और बाह्य) में भी प्रज्ञ नहीं है। वह प्रज्ञानघन नहीं है, न प्रज्ञ (बहुत जानने वाला) हो है, न अप्रज्ञ (बिना जानने वाला) होकर भी इसे कुछ जानना शेष है। इसके अतिरिक्त निर्वाण के लिए और कोई उपदेश (अनुशासन) नहीं है अर्थात् मोक्ष के लिए यही अनुशासन है। यहीं वेद की शिक्षा व अनुशासन है॥